जैसे ही त्योहारों का मौसम करीब आता है, भारत भर के दफ्तरों, कारखानों और दुकानों में एक ही सवाल गूंजने लगता है: “क्या दिवाली एक अनिवार्य सवैतनिक अवकाश (Paid Holiday) है?” भारतीय श्रम कानून में इसका जवाब सिर्फ ‘हां’ या ‘ना’ में नहीं दिया जा सकता। यह एक बहु-स्तरीय कानूनी व्यवस्था है, जिसमें केंद्र सरकार, राज्य विधानमंडल और आपका रोजगार अनुबंध (Employment Contract) सभी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं।
संक्षेप में कहें तो, भारत का कोई भी एक केंद्रीय कानून सभी निजी क्षेत्र (Private Sector) के कर्मचारियों के लिए दिवाली को सवैतनिक छुट्टी के रूप में अनिवार्य नहीं बनाता है। जहां परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 25 बैंकों और सरकारी दफ्तरों के लिए सार्वजनिक छुट्टियों को नियंत्रित करती है, वहीं निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को दिवाली की सवैतनिक छुट्टी का अधिकार तीन अलग-अलग कानूनी माध्यमों से मिलता है: आपके राज्य का विशेष श्रम कानून, आपके रोजगार अनुबंध की शर्तें, या कार्यस्थल पर लंबे समय से चली आ रही प्रथा।
केंद्रीय कानूनी ढांचा: संसद दिवाली की छुट्टी को अनिवार्य क्यों नहीं बनाती?
21 नवंबर 2025 से लागू हुईं चार केंद्रीय श्रम संहिताएं (Labour Codes), जिन्होंने 29 पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित किया है, विशेष त्योहारी छुट्टियों के विषय पर मौन हैं। हालांकि व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 (OSHWC Code, 2020) (जिसने कारखाना अधिनियम, 1948 का स्थान लिया है) काम के घंटों, साप्ताहिक अवकाश, ओवरटाइम और वार्षिक अर्जित अवकाश (Earned Leave) को व्यापक रूप से नियंत्रित करती है, लेकिन यह जानबूझकर कोई राष्ट्रीय त्योहारी अवकाश कैलेंडर निर्धारित नहीं करती है।
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत, ‘श्रम’ का विषय समवर्ती सूची (Concurrent List – List III) में आता है, जो संसद और राज्य विधानमंडलों दोनों को कानून बनाने का अधिकार देता है। चूंकि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं काफी भिन्न हैं, इसलिए संसद ने ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रीय और त्योहारी छुट्टियों से जुड़े नियम बनाने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों पर छोड़ दी है।
मुख्य कानूनी आधार: आपके राज्य का कानून
राज्य सरकारें मुख्य रूप से दो कानूनी माध्यमों से निजी क्षेत्र में त्योहारी छुट्टियों को नियंत्रित करती हैं:
- विशेष “राष्ट्रीय और त्योहारी अवकाश” (NFH) अधिनियम: कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और ओडिशा जैसे राज्यों ने अलग से विशेष कानून बनाए हैं, जो कारखानों, दुकानों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में हर साल न्यूनतम संख्या में सवैतनिक राष्ट्रीय और त्योहारी छुट्टियां देना अनिवार्य करते हैं।
- दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम (Shops and Establishments Acts): महाराष्ट्र जैसे कई अन्य राज्यों ने अपने दुकान एवं प्रतिष्ठान कानून के भीतर ही सवैतनिक त्योहारी छुट्टियों का कोटा निर्धारित किया है।
इन राज्य कानूनों के तहत, नियोक्ताओं (Employers) को प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में सवैतनिक छुट्टियों का एक निश्चित कोटा देना अनिवार्य है। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये कानून शायद ही कभी दिवाली को स्वतः ही एक निश्चित और गैर-परिवर्तनीय छुट्टी के रूप में नामित करते हैं। इसके बजाय, त्योहारी कोटा वाले राज्यों के कानून 3 से 5 निश्चित दिन (जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गांधी जयंती, मई दिवस या राज्य स्थापना दिवस) तय करते हैं और शेष “त्योहारी छुट्टियों” के कोटे को कर्मचारियों या श्रम निरीक्षक (Labour Inspector) के परामर्श से राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त सूची में से चुनने का निर्देश देते हैं। जब दिवाली को नियोक्ता की वार्षिक अधिसूचित अवकाश सूची (Notified Holiday List) में शामिल कर लिया जाता है, तब यह कानूनी रूप से लागू होने योग्य सवैतनिक अवकाश बन जाती है।
विभिन्न राज्यों के नियमों की स्थिति
| राज्य | लागू कानून (Statute) | दिवाली की छुट्टी पर कानूनी स्थिति |
| महाराष्ट्र | महाराष्ट्र दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम, 2017 (धारा 18(7)) | 10 या अधिक कामगारों वाले प्रतिष्ठानों के लिए 8 सवैतनिक छुट्टियां अनिवार्य हैं: 4 निश्चित दिन (26 जनवरी, 1 मई, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर) और वर्ष की शुरुआत से पहले नियोक्ता तथा कामगारों की आपसी सहमति से तय की गई 4 त्योहारी छुट्टियां। इन चार छुट्टियों में चुने जाने के बाद दिवाली की छुट्टी कानूनी रूप से बाध्यकारी हो जाती है। |
| कर्नाटक | कर्नाटक औद्योगिक प्रतिष्ठान (राष्ट्रीय एवं त्योहारी अवकाश) अधिनियम, 1963 (धारा 3) | कम से कम 10 सवैतनिक छुट्टियां अनिवार्य हैं: 5 निश्चित दिन (26 जनवरी, 1 मई, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर और कन्नड़ राज्योत्सव के लिए 1 नवंबर) तथा कर्मचारियों के परामर्श से चुनी गईं और श्रम निरीक्षक को प्रस्तुत की गईं 5 त्योहारी छुट्टियां। |
| तमिलनाडु | तमिलनाडु औद्योगिक प्रतिष्ठान (राष्ट्रीय, त्योहारी और विशेष अवकाश) अधिनियम, 1958 (धारा 3) | कुल 9 सवैतनिक छुट्टियां अनिवार्य हैं: 4 निश्चित दिन (26 जनवरी, 1 मई, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर) और नियोक्ता व कर्मचारियों के परामर्श से निरीक्षक द्वारा निर्धारित 5 त्योहारी छुट्टियां। |
| दिल्ली | दिल्ली दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम, 1954 (धारा 16) | इसमें स्पष्ट रूप से 3 सवैतनिक राष्ट्रीय अवकाश (26 जनवरी, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर) अनिवार्य किए गए हैं। अधिनियम के मूल पाठ में अतिरिक्त सवैतनिक त्योहारी छुट्टियों (जैसे दिवाली) का कोई अलग संख्यात्मक कोटा निर्धारित नहीं है; इसके बजाय, कार्यालय इन्हें प्रथा, रोजगार अनुबंध, या दिल्ली सरकार (GNCTD) की वार्षिक राजपत्रित अवकाश अधिसूचनाओं के आधार पर प्रदान करते हैं। |
अनुबंध और प्रथागत अधिकारों की भूमिका
जहां राज्य का कानून त्योहारों के चयन में लचीलापन देता है, वहां भी नियोक्ता निम्नलिखित कारणों से दिवाली की छुट्टी देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हो सकता है:
- कंपनी की नीति या रोजगार अनुबंध: एक बार जब कोई नियोक्ता अपना वार्षिक अवकाश कैलेंडर प्रकाशित कर देता है (या नियुक्ति पत्र अथवा एचआर हैंडबुक में सवैतनिक छुट्टियों का उल्लेख करता है) और उसमें दिवाली को शामिल करता है, तो यह सेवा की एक बाध्यकारी अनुबंधीय शर्त बन जाती है।
- प्रथागत नियम और परिवर्तन की सूचना (Notice of Change): यदि कोई छुट्टी लंबे समय से लगातार दी जा रही है, तो वह प्रथा और चलन के माध्यम से सेवा की एक अंतर्निहित शर्त (Implied Condition of Service) बन जाती है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code, 2020) की धारा 40 (जिसने पूर्ववर्ती औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 9A का स्थान लिया है) के तहत, कोई भी नियोक्ता कम से कम 21 दिनों की पूर्व लिखित सूचना दिए बिना “कामगारों” (Workers) के लिए तीसरी अनुसूची (Third Schedule) (जो पहले चौथी अनुसूची थी) में उल्लिखित सेवा शर्तों में एकतरफा बदलाव नहीं कर सकता, जिसमें “सवैतनिक अवकाश और छुट्टियां” तथा किसी प्रथागत रियायत या विशेषाधिकार को वापस लेना शामिल है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी (विशेष रूप से टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड बनाम वर्कमेन, 1972 के मामले में) यह स्पष्ट किया है कि स्थापित अवकाश प्रथाओं में बदलाव करना सेवा की शर्तों को प्रभावित करता है और इसके लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
यदि दिवाली के दिन आपसे काम करने के लिए कहा जाए तो क्या होगा?
यदि आपके प्रतिष्ठान के लिए दिवाली एक घोषित अवकाश है (राज्य की अधिसूचित सूची या कंपनी नीति के तहत) और फिर भी आपको काम करने के लिए बुलाया जाता है, तो राज्य कानूनों में इसके लिए स्पष्ट मुआवजे का प्रावधान है:
- राज्य दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियमों के तहत: महाराष्ट्र जैसे राज्यों (धारा 18(7)) में, यदि किसी कर्मचारी को घोषित सवैतनिक अवकाश के दिन काम करने के लिए बुलाया जाता है, तो वह उस दिन के लिए सामान्य वेतन से दोगुने वेतन (200%) का हकदार होता है, या फिर उस दिन के सामान्य वेतन के साथ किसी अन्य कार्यदिवस पर एक सवैतनिक प्रतिपूरक अवकाश (Compensatory Off) पाने का अधिकारी होता है।
- राज्य राष्ट्रीय और त्योहारी अवकाश अधिनियमों के तहत: कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों (उनके संबंधित NFH अधिनियमों की धारा 5) में, अधिसूचित त्योहारी छुट्टी पर कर्मचारी को काम पर बुलाने वाले नियोक्ता को सामान्यतः पूर्व सूचना देनी होती है और विकल्प के रूप में या तो दोगुना वेतन (200%) देना होता है या उस दिन के सामान्य वेतन के साथ एक वैकल्पिक सवैतनिक अवकाश (Substituted Holiday) प्रदान करना होता है।
कर्मचारियों और नियोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण बातें
- कर्मचारियों के लिए: अपने राज्य के दुकान अधिनियम या NFH अधिनियम के साथ-साथ अपनी कंपनी के नोटिस बोर्ड या HRMS पोर्टल पर प्रदर्शित वार्षिक वैधानिक अवकाश सूची की जांच करें (जिसे हर कैलेंडर वर्ष की शुरुआत में प्रकाशित करना नियोक्ताओं के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य है)। यदि दिवाली आपकी कंपनी की अधिसूचित अवकाश सूची में शामिल है और आपसे उस दिन काम करवाया जाता है, तो आप कानूनी तौर पर दोगुने वेतन या सवैतनिक प्रतिपूरक अवकाश (Compensatory Off) के हकदार हैं।
- नियोक्ताओं के लिए: यह सुनिश्चित करें कि आपका वार्षिक अवकाश कैलेंडर उन सभी राज्यों के न्यूनतम कानूनी मानकों को पूरा करता हो जहां आपका व्यवसाय संचालित है। इसमें सभी निश्चित राज्य छुट्टियां (जैसे महाराष्ट्र में 1 मई या कर्नाटक में 1 नवंबर) शामिल करें, परामर्श और सूचना दर्ज करने की कानूनी प्रक्रिया (जैसे कर्नाटक में फॉर्म I) का पालन करें, और इसे प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी से पहले अनिवार्य रूप से प्रकाशित करें।
अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल भारतीय श्रम और रोजगार कानूनों से संबंधित सामान्य शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है तथा इसे औपचारिक कानूनी सलाह या कानूनी राय नहीं माना जाना चाहिए। वैधानिक अवकाश के अधिकार, ओवरटाइम वेतन और अनुपालन की प्रक्रियाएं संबंधित राज्य के अधिकार क्षेत्र, प्रतिष्ठान की प्रकृति (औद्योगिक या वाणिज्यिक), कर्मचारी की श्रेणी और राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर जारी राजपत्रित अधिसूचनाओं के आधार पर भिन्न हो सकती हैं। इस सामग्री को पढ़ने या इस पर निर्भर रहने से किसी भी प्रकार का वकील-मुवक्किल या सलाहकार-ग्राहक संबंध स्थापित नहीं होता है। नियोक्ताओं, एचआर पेशेवरों और कर्मचारियों को सलाह दी जाती है कि वे कार्यस्थल की अवकाश नीतियों में कोई भी बदलाव करने या कानूनी कदम उठाने से पहले अपने राज्य के नवीनतम नियमों की पुष्टि करें और किसी योग्य श्रम कानून विशेषज्ञ से परामर्श लें।
